चिट्ठाकारी

January 11, 2008

मीडिया प्रसन्न , चिट्ठेकार सन्न ….

सरकार प्रसन्न ,  

घोड़ा सन्न ,

कि घोड़े से तेज दौड़ता है -

कागज का घोड़ा .

- राजेन्द्र राजन

    कवि मित्र राजेन्द्र राजन की यह छोटी-सी कविता उनकी ‘घोड़ा’ – सिरीज़  से ली गई है । कई अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया प्रतिष्ठानों द्वारा ब्लॉगों के ‘घुड़साल’ या अस्तबल शुरु किए जाने की सूचना पाने के बाद से  इसका बार-बार याद आना लाजमी है । अस्तबल शब्द शायद अंग्रेजी के stable से पहले गढ़ा गया होगा , ध्वनि और तवारीख के लिहाज से लगता है । विलायत में घोड़े पहुँचे ही कब ?  पक्की सूचना अजित दे सकते हैं ।

    अपने देश में हम जैसे दिल्ली के अखबारों और चैनलों को राष्ट्रीय चैनल और दिल्ली के बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय बुद्धिजीवी मान लेते हैं उसी गणित से अमेरिकी हफ़िंग्टन पोस्ट या इग्लैंड के गार्जियन अखबार का ‘कमेन्ट इज़ फ़्री’ जैसे चिट्ठों के अस्तबलों को अन्तर्राष्ट्रीय चिट्ठा-घुड़साल मानना होगा । साइबर जगत  के ’ऑस्कर’ कहे जाने वाले पुरस्कार(इन वेब्बी पुरस्कारों पर फिर कभी) इन्हें मिलेते रहे हैं । इन मीडिया – चिट्ठों की सामग्री तय करने में अखबार के स्थापित स्तंभकारों के अलावा कुछ चर्चित चिट्ठेकार भी चुने जाते हैं । गार्जियन के अस्तबल की शुरुआत में अखबार के चार वरिष्ठ सम्पादकीय स्टाफ़ को जिम्मा दिया गया कि वे चिट्ठे और अखबार के बीच तालमेल बैठाने का काम करें । गार्जियन अनलिमिटेड की मुख्य सम्पादक एमिली बेल और ज्यॉर्जिना हेनरी इस परियोजना की शुरुआत से जुड़ी रहीं । एमिली बताती हैं ,’ गत वर्ष मार्च महीने(२००६) में मैंने इस काम को शुरु किया। दो महीने बीतते-बीतते  पेशेवर स्तंभकारों और चिट्ठेकारों (जिन्हे मैं लिखने के लिए चुनती थी) के सन्दर्भ में मुझे अपना नजरिया बदलना पड़ा । ये चिट्ठेकार मुझे अत्यन्त बहुश्रुत और पाण्डित्यपूर्ण लगे ।’ इन चिट्ठेकारों द्वारा बिना मेहनताना लिए अपनी रुचि के विषयों पर बहस शुरु करने की ललक देख कर एमिली अचरज में पड़ जाती हैं । हांलाकि प्रतिदिन चुने गये टिप्पणीकारों और अखबार द्वारा निमंत्रित टिप्पणीकर्ताओं को धन भी दिया जाता है।

    चिट्ठे चुनने का क्रम हिन्दी में भी शुरु हुआ है , फिलहाल बिना ईनाम।यहाँ यह शुरु करने वाले चिट्ठे शशि cum(या कम ?) अस्तबल ज्यादा  लोकमंच हैं। इस प्रयोग(गार्जियन वाले) से जुड़े रसब्रिजर कहते हैं , ‘हमने जो प्रयोग किया है वह पहले किसी अखबार ने न किया होगा – दरमाह पाने वाले स्थापित प्रभु-स्तंभकारों को हम उसी अखाड़े में उतारते हैं जहाँ बिना पैसों के लिखने वाले हैं।पेशेवर पत्रकारिता क्या है और क्या नहीं , और दोनों एक ही अखाड़े में कैसे चलेंगे यह हम इस प्रयोग के दौरान तय करेंगे।’

    बहरहाल इस स्थापित मीडिया समूह ( गार्जियन) को अपने अस्तबलों से जो मिला है उस पर गौर करें : ५०,००० पाठक टिप्पणियाँ और मासिक बीस लाख देखने वाले । एमिली बताती है कि  हफ़िग्टन पोस्ट नौ महीने में ५०० चिट्ठेकारों को जोड़ सका था,हमने यह संख्या दो महीने में हासिल कर ली । एमिली का कहना है , ‘ हर युवा पत्रकार को चिट्ठेकारी पर हाथ आजमाना चाहिए ।’ यहाँ हाथ आजमाना शुरु करते न करते मुक्ति का बोध होने लगता है।

    इस माध्यम (चिट्ठाकारी) में सबसे जरूरी है पारदर्शिता । कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़ते वक्त यदि स्रोतों का जानबूझकर जिक्र न हो या अथवा किसी के अन्य स्थलों पर लिखे गये बयानों को ऐसे जोड़ देने से मानो वे बयान भी वहीं दिये गये हों बवेला ज्यादा होता है । - ऐसे में चिट्ठालोक में विश्वसनीयता ज्यादा तेजी से लुप्त हो जाती है और लुप्त हो जाते हैं पाठक । हाल ही में प्रसिद्ध हॉलीवुड अभिनेता ज्यॉर्ज क्लूनी के सी.एन.एन के चर्चित कार्यक्रम लैरी किंग लाइव तथा गार्जियन को दिये गये साक्षात्कारों को हफ़िंग्टन पोस्ट के मोहल्ले  अस्तबल पर क्लूनी की चिट्ठा प्रविष्टि के तौर पर छापने पर विश्वसनीयता का सवाल उभर कर आया था। इस प्रविष्टि के साथ मूल स्रोत का जिक्र नहीं था।क्लूनी को कहना पड़ा , ‘मैं उन बयानों पर कायम हूँ लेकिन यह चिट्ठा मैंने नहीं लिखा । सुश्री हफ़िंग्टन ने मेरे पूर्व के साक्षात्कारों से सामग्री लेने की अनुमति भी मुझसे ली थी।मुझसे उन्होंने सिर्फ़ मेरे उत्तरों को(प्रश्न हटा कर) सम्मिलित करने की अनुमति नहीं ली थी और इसी कारण पाठकों को यह लग रहा है कि यह मेरा लेख है।मुझसे पूछे गए सवालों के जवाबों और मेरे मौलिक लेख में अन्तर होगा ही ।’

    टेलिविजन ,अखबार या रेडियो फोन कम्पनियों से व्यावसायिक सौदा तय कर के चाहे जितने पूर्व-निर्धारित, निश्चित विकल्पों वाले एस.एम.एस. प्राप्त कर लें और उन्हें फ़ीडबैक की संज्ञा दें ,  इन माध्यमों में संवाद मोटे तौर पर एकतरफा ही होता है । संजाल पर परस्पर होने वाले संवाद की श्रेष्ठता इन सब पर भारी है । ऐसे में अन्य माध्यमों द्वारा संजाल पर हाथ आजमाने को जरूर बढ़ावा दिया जायेगा ।

     फिर दिल्ली की राष्ट्रीय मीडिया हस्तियाँ अपने कारिन्दों को अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया समूहों की नकल करने के लिए प्रोत्साहित ही करेंगी अथवा नहीं ? क्योंकि कागजी घोड़ों से भी तेज होता है साइबर घोड़ा ।

January 10, 2008

चिट्ठाकारी : अपठित महान – महा अपठित

Filed under: चिट्ठाकारी — अफ़लातून @ 3:05 pm
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[ चिट्ठाकारी पर पिछली पोस्ट से कुछ अनुदित सामग्री सम्पादित कर यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। हिन्दी चिट्ठेकारों ने विषय में रस लिया और बहस भी चलायी । आज निकोलस कार्र के चिट्ठे से यह बहुचर्चित वक्तव्य यहाँ दिया जा रहा है । ]

मंगलाचरण

    किसी जमाने की बात है चिट्ठालोक नामक एक टापू था जिसके बीचोबीच पत्थर का एक विशाल किला था । किले के चारों ओर मीलों तक टीन , गत्ते और फूस की मड़इयों में रहने वाले किसानों की बस्तियाँ थीं ।

भाग एक

    निरीह कपट का स्वरूप

    मैं जॉन केनेथ गालब्रेथ की लिखी एक छोटी किताब पढ़ रहा था,यूँ कह सकते हैं कि यह एक निबन्ध है -  ‘  निरीह कपट का अर्थशास्त्र ‘ ( Economics of Innocent Fraud ) . यह उनकी आखिरी किताब है जिसे उन्होंने अपनी जिन्दगी के नौवें दशक में , मरने के कुछ समय पहले ही पूरा किया । ( गालब्रेथ पूँजीवाद के प्रबल प्रवक्ता , पुरोधा और झण्डाबरदार रहे हैं । – अफ़लातून । किताब में उन्होंने समझाया है कि अमेरिकी समाज कैसे ‘पूँजीवाद’ के लिए अब ‘बाजार अर्थव्यवस्था’ शब्द का इस्तेमाल करने लगा है । नया नाम पहले वाले से कुछ मृदु और नम्र है , मानो यह अन्तर्निहित हो कि अब आर्थिक सत्ता  उपभोक्ता की हाथों में आ गयी है बनिस्पत  पूँजी के मालिकों या  उनका काम करने वाले प्रबन्धकों के । गालब्रेथ इसे निरीह कपट का सटीक उदाहरण मानते हैं ।

  निरीह कपट भी एक झूठ है जो काला नहीं सफ़ेद होता है । यह सभी को खुशफ़हमी में रखता है। यह एक ओर ताकतवर लोगों के मन माफ़िक होता है क्योंकि यह उनकी पूरी सत्ता को ढँक देता है , वहीं सत्ता विहीन लोगों के मन माफ़िक इसलिए होता है कि उनकी सत्ताहीनता को भी आवृत कर देता है ।

    चिट्ठालोक के बारे में हम खुद को कहते हैं कि - नियन्त्रित और नियन्ता जन-सम्प्रेषण माध्यम के मुकाबले यह माध्यम खुला , लोकतांत्रिक और समतामूलक है । ऐसा कहना निरीह कपट है ।

भाग दो

    लम्बी पूँछ वाले चिट्ठाकारों का अकेलापन

    निरीह कपट की विशेषता हाँलाकि यह है कि इसके आर – पार दिखाई पड़ता है , परन्तु अक्सर लोग आर – पार न देखने की कोशिश करते हैं , और कुछ लोगों के लिए कभी – यह कोशिश भी व्यर्थ रह जाती है । कुछ दिनों पहले चिट्ठाकार केन न्यूसम ने सवाल खड़ा किया : ” हमारे चिट्ठों के पाठक कौन हैं ? ” उसके जवाब में अवसाद की झलक थी :

    चिट्ठालोक में चिट्ठेकारों के बीच ध्यान खींचने की ऐसी होड़ लगी रहती है कि आभास होता है कि यह एक बहुत बड़ी-सी जगह है , मानो मछली बाजार । यह केवल आभास है दरअसल एक बड़े हॉल के आखिरी छोर पर बने एक छोटे से कमरे में हम सब पहुँच जाते हैं। जब लोग संवाद बनाने से इन्कार करते हैं किन्तु किसी हद को पार कर अपने चिट्ठे की कड़ी लगवाना चाहते हैं तब थोड़ा कष्ट जरूर होता है । यह कष्ट तब तक जारी रहता है जब तक मुझे इस बात का अहसास नहीं हो जाता कि , ‘ चलो मेरी बात न सुने भले , वास्तविक जगत में कोई उन्हें भी तो नहीं सुन रहा ‘ ।

    मुझे गलत मत समझिएगा -  लिखने में मुझे रस मिलता है । कभी – कभी जब हम कुछ लिख कर चिट्ठे पर डाल देते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि कोई टिप्पणी आएगी अथवा कोई उस पोस्ट की कड़ी उद्धृत कर देगा , तब एक अजीब  अवसाद-सा तिरता है , माहौल में।

    मुष्टिमेय लोगों ने इस प्रविष्टि पर अपनी राय प्रकट की जिनमें लम्बे समय से चिट्ठाकारी कर रहे सेथ फ़िन्कल्स्टीन भी थे । फ़िन्कल्स्टीन के स्वर में कहीं अधिक निराशा का पुट था।उनकी प्रतिक्रिया में तथ्य को स्वीकार कर लेने के साथ एक कटुता भी देखी जा सकती है जो किसी कपट की पोल खुलने पर प्रकट होती है  :

व्यक्तिगत तौर पर बताऊँ तो यह कह सकता हूँ कि मैं इन कारणों से लिखता था :

  1. मुझे यह कह कर मूर्ख बनाया गया कि चिट्ठे खुद की आवाज सुनाने के लिए तथा मीडिया के विकल्प के रूप में  होते हैं ।
  2. मुझे भ्रम था कि यह प्रभावशाली है ।
  3. कभी-कदाच ध्यान खींच लेने पर यह बहुत असरकारक साधन लगने लगता है , यथार्थ से बढ़कर ।
  4. यह स्वीकृति कष्टपूर्ण है कि आपने इतना समय और प्रयत्न जाया किया लेकिन कोई आप की सुनता नहीं ।

        चिट्ठाकारी को धार्मिक सुसमाचार (Blog Evangelist) मानने की निष्ठा अत्यन्त क्रूर होती है चूँकि वह लोगों की कुण्ठित उम्मीदों और ख्वाबों का शिकार करती है ।

       मेरा चिट्ठा कुछ दर्जन प्रशंसकों द्वारा पढ़ा जाता है । कई बार बन्द करने की नौबत आई है और आखिरकार वह चरम-बिन्दु भी आ ही जाएगा ।

    किसी निरीह कपट के स्थायी हो जाने पर ताकतवर लोगों का बड़ा  दाँव लगा होता है, ताकतहीन लोगों की बनिस्पत । ताकतहीन लोगों द्वारा इस कपट के प्रति अविश्वास को टालते रहने को निलम्बित करने के काफ़ी समय बाद तक ताकतवर इस कपट से लिपटे रहेंगे , सच के विकल्प की अनुगूँज सुनाने वाले एक  कक्ष में एक दूसरे को अन्तहीन समय तक यह सुनाते हुए।

उपसंहार

        एक दिन एक चिट्ठा-किसान लड़के को अपनी मड़ई के निकट धूल के ढेर में एक स्फटिक का गोला पड़ा मिला । उस गोले में झाँकने पर वह चकित हो गया , उसने एक चलचित्र देखा । व्यापारिक पोतों का एक बेड़ा चिट्ठालोक के बन्दरगाह में प्रवेश कर रहा था।जहाजों पर वे नाम अंकित थे जो टापू भर में हमेशा से घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे । टाइम-वॉर्नर और न्यूज कॉर्प और पियरसन और न्यू यॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल और कोन्डे नोस्ट और मैक्ग्रॉ हिल । चिट्ठा -किसान तट पर जुट गए , जहाजों पर ताने मारते हुए ,आक्रमणकारियों को ललकारा कि हमारे बड़े किले के ठाकुरों द्वारा तुम्हारा बेड़ा शीघ्र गर्क कर दिया जाएगा । व्यापारिक पोतों के जहाजों के कप्तान सोने से भरे टोकरे ले कर जब किले के द्वार तक पहुँचे , तब उन्हें ठाकुरों  की तोपों का सामना करने के बजाए तुरही-नाद सहित स्वागत मिला । चिट्ठा – किसानों को रात भर महाभोज से आने वाली ध्वनियाँ सुनाई देती रहीं ।

   

4 Responses to “अपठित महान : महा अपठित”

  1. on June 12, 2007 at 9:43 pm1 धुरविरोधी

    आपने एकदम यथार्थ परक लिखा है.

    यह यक्षप्रश्न मेरे आगे भी बार बार खड़ा हो जाता है कि हमारे चिठ्ठों का पाठक कौन है? क्या हम सभी ब्लागर आपस में लठ्ठमलठ्ठा कर रहे हैं? हिन्दी में सर्वाधिक पढ़ी गयी पोस्ट नारद में सिर्फ 250 हिट्स दिखाती है. इतनी हिट्स भी सिर्फ आपस की टिप्पणी को बार बार पढ़ने पर हुईं हैं. यथार्थ में तो हमारे ब्लाग्स के पाठक एक अर्धशतक पर भी नहीं पहुंचते.

    कल मुझे श्री चौपटस्वामी के ब्लाग पर ब्लाग के बारे में व्याख्या मिली कि चिठ्ठा हमारा एक ‘स्वकथन’ है, बिलकुल रंगमंच की तरह, जिस पर हमें तुरन्त फुरन्त तालियां या गालियां मिल जाती हैं.

  2. on June 12, 2007 at 10:19 pm2 arun

    धुर विरोधी जी से सहमती के स्वर निकालने वाला बाजा बजाने के अलावा और कोई चारा हमारे पास नही है

  3. on June 13, 2007 at 12:40 am3 अनूप शुक्ल

    सही है!

  4. on June 15, 2007 at 4:44 am4 अभय तिवारी

    सही समय पर यह लेख पढ़्वाया है अफ़लातून भाई… धन्यवाद.

    [ मूल पोस्ट ]

January 9, 2008

चिट्ठे इन्क़लाब नहीं लाते !

Filed under: क़ानून, चिट्ठाकारी — अफ़लातून @ 12:43 pm

[ ‘बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते' - शहीदे आजम भगत सिंह का यह बयान जैसे कइयों के गले नहीं उतरता वैसे ही कुंजी-पटल के योद्धा भी यह सुनना नहीं चाहेंगे कि ‘ चिट्ठे इन्कलाब नहीं लाते'। ऐसा मानने वाले कुछ स्थापित चिट्ठेकारों के विचार यहाँ दिए जा रहे हैं। सेथ फिंकल्स्टीन, केन्ट न्यूसम, निकोलस कार आदि कई प्रमुख चिट्ठेकार इस मत के हैं। ]

सेथ फिंकलस्टीन

दमनकारी सरकारों द्वारा सेन्सरवेयर (सेन्सर हेतु इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ़्टवेयर) का इस्तेमाल अब वैधानिक नीति का हिस्सा बन चुका है। इस बाबत संगोष्ठियाँ आयोजित हो रही हैं, सिफ़ारिशें दी जा रही हैं तथा लेख लिखे जा रहे हैं। वैश्विक-सेन्सरशिप के विरुद्ध लड़ाई में हमारा क्या योगदान हो सकता है ? – इसका जवाब लोग जानना चाहते हं ।

दुर्भाग्यवश मेरे उत्तर लुभावने नहीं हैं । गैर सरकारी संस्थाओं, थिंक टैंक्स और शैक्षणिक संस्थाओं में श्रेणीबद्धता है तथा इनमें प्रवेश-पूर्व बाधायें भी होती हैं, जिन्हें पार करना पड़ता है। बरसों पहले जब इन्टरनेट का विस्तार कम था तब किसी व्यक्ति द्वारा खुद को सुनाने का मकसद ज्यादा विस्तृत तौर पर पूरा होता था। इन्टरनेट के व्यापक समाज का हिस्सा बन जाने के बाद एक अदद व्यक्ति की हैसियत और उसका असर उसी तरह हाशिए पर पहुँच गया है जितना समाज में उस व्यक्ति का होता है । ऐसा नहीं कि किसी भी व्यक्ति की आवाज बिलकुल ही न सुनी गई हो – परन्तु यहाँ भी स्थापित सामाजिक संगठनों के ढाँचे की सत्ता आम तौर पर हावी हो जाती है ।

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January 7, 2008

इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून

Filed under: इंटरनेट, क़ानून, चिट्ठाकारी — सृजन शिल्पी @ 10:50 pm

पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा।

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